भारतीय योग परंपरा में योग ग्रंथों के संदर्भ मे शिव संहिता में ज्ञानयोग का स्वरूप
सौदामिनी गुप्ता1, शषिकांत मणि त्रिपाठी2
1लेखिका, पीएच डी स्कॉलर (योग), सैम ग्लोबल यूनिवर्सिटी भोपाल, मध्यप्रदेष।
2पर्यवेक्षक, एसोसिएट प्राध्यापक (योग विभाग), सैम ग्लोबल यूनिवर्सिटी भोपाल, मध्यप्रदेष।
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ABSTRACT:
भारतीय योग परम्परा में योग के विभिन्न आयाम हैं जिसमें से कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं भक्तियोग प्रमुख हैं। वास्तव में योग एक अध्यात्मिक प्रक्रिया है, जिसमें शरीर, मन एवं आत्मा को एक साथ लाने का प्रयास किया जाता है। योग शब्द की निष्पत्ति ‘युज’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है युक्त होना, जोड़ना अथवा मिलाना। अर्थात संयम पूर्वक साधना करते हुए आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़कर समाधि अवस्था में पहुंचना ही योग है। ज्ञान तथा योग का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। एक के बिना दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ज्ञानयोग के सिद्धांत के अनुसार ज्ञानयोग के अनुसार आत्मा आनंदस्वरूप, ज्ञानस्वरूप, सत्, कूटस्थ, नित्य, शुद्ध, बुद्ध है। अपने वास्तविक स्वरूप में में आत्मा ब्रह्म ही है। ज्ञानयोग के अनुसार जीव ब्रह्म की एकता का ज्ञान हो जाना ही योग है।
KEYWORDS: ज्ञान] ज्ञानयोग] षिवसंहिता ।
INTRODUCTION:
षिव संहिता में भगवान षिव द्वारा अपने प्रिय षिष्या पार्वती को दिए गये योग का वर्णन है। षिव संहिता का एक अर्थ षिवतत्व को प्राप्त करने वाली संहिता है। षिव अर्थात् कल्याणकारी अर्थात जिस ग्रन्थ में मानव जीवन के लिए बहुत कल्याणकारी उपदेषों का वर्णन है, वह षिव संहिता है। भगवान् षिव ने षिव संहिता में ज्ञान एवं योग का अभ्यास दोनों को समान महत्व दिया है। शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए योग का अभ्यास एवं मानव जीवन में परम शांति प्राप्त करने के लिए ज्ञान की चर्चा की है। ज्ञानयोग और स्वयं की जानकारी प्राप्त करने को कहते है। ये अपनी और अपने परिवेष को अनुभव करने के माध्यम से समझना है। ज्ञान के माध्यम से ईष्वरीय स्वरूप का ज्ञान, वास्तविक सत्य का ज्ञान ही ज्ञानयोग का लक्ष्य है।
ज्ञानयोग क्या है?
अध्यात्मिक क्षेत्र में साधक का जो मार्ग होता है अर्थात् जिस प्रकार के साधनों का वह प्रयोग करता है उन्ही के अनुरूप उसकी साधना का नाम होता है। ज्ञान के द्वारा सर्वोच्च अवस्था की प्राप्ति के मार्ग को ज्ञानयोग कहा गया है।
ज्ञानयोग से तात्पर्य है- विषुद्ध आत्मस्वरूप का ज्ञान या आत्मचैतन्य की अनुभूति है । इसे उपनिषदों में ब्रह्मानुभूति भी कहा गया है और यह भी कहा गया है कि-
‘‘ऋते ज्ञानन्न मुक्तिः‘‘
ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं है।
ज्ञानयोग के साहित्य में उपनिषत्, गीता, तथा आचार्य शंकर के अद्वैतपरक ग्रन्थ तथा उन पर भाष्यपरक ग्रन्थ हैं इन्हीं से ज्ञान योग की परम्परा दृढ़ होती है। आधुनिक युग में विवेकानन्द आदि विचारकों के विचार भी इसमें समाहित होते हैं। पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के अनुसारः- ज्ञानयोग अध्यात्म मार्ग की प्रारंभिक साधना है, जिस पर अवलंबित होना हर एक प्राथमिक जिज्ञासु के लिए अनिवार्यतः आवष्यक है।1
ज्ञानयोग का स्वरूप
ज्ञानयोग दो शब्दों से मिलकर बना है- ज्ञान तथा योग । ज्ञान शब्द के कई अर्थ किए जाते हैं-
लौकिक ज्ञान - वैदिक ज्ञान, साधारण ज्ञान - असाधारण ज्ञान, प्रत्यक्ष ज्ञान - परोक्ष ज्ञान। किन्तु ज्ञानयोग में उपरोक्त मन्तव्यों से हटकर अर्थ सन्निहित किया गया है। ज्ञान शब्द की उत्पत्ति ज्ञ धातु से हुई है, जिससे तात्पर्य है- जानना, बोध, साक्षात् अनुभव अथवा प्रकाष। सरल शब्दों में कहा जाये तो किसी वस्तु अथवा विषय के स्वरूप का वैसा ही अनुभव करना ही पूर्ण ज्ञान है। इस जानने में केवल वस्तु ;व्इरमबजद्ध के आकार प्रकार का ज्ञान समाहित नहीं है, वरन् उसके वास्तविक स्वरूप की अनुभूति भी समाहित है। इस प्रकार ज्ञानयोग में यही अर्थ मुख्य रूप से लिया गया है।
ज्ञानयोग में ज्ञान से आषय अधोलिखित किये जाते हैं-
1. आत्मस्वरूप की अनुभूति।
2. ब्रह्म की अनुभूति।
3. सच्चिदानंद की अनुभूति।
4. विषुद्ध चैतन्य की अवस्था।
ज्ञानयोग के दार्षनिक आधार:-
ज्ञानयोग जिस दार्षनिक आधार को अपने में समाहित करता है वह ब्रह्म ही मूल तत्व है उसी की अभिव्यक्ति परक समस्त सृष्टि है। इस प्रकार मूल स्वरूप का बोध होना अर्थात ब्रह्म की अनुभूति होना ही वास्तविक अनुभूति या वास्तविक ज्ञान है एवं इस अनुभूति को कराने वाला ज्ञानयोग है। व्यक्ति परमात्मा को ज्ञान मार्ग से पाना चाहता है। वह इस संसार की छोटी-छोटी वस्तुओं से संतुष्ट होने वाला मनुष्य नहीं है। अनेक ग्रन्थों के अवलोकन से भी उसे सन्तुष्टि नहीं मिलती। उसकी आत्मा सत्य को उसके प्राकृत रूप में देखना चाहती है और उस सत्य-स्वरूप का अनुभव करके, तदु्रप होकर, उस सर्वव्यापी परमात्मा के साथ एक होकर सत्ता के अंतराल में समा जाना चाहती है। ऐसे दार्षनिक के लिए तो ईष्वर उसके जीवन का जीवन है, उसकी आत्मा की आत्मा है। ईष्वर स्वयं उसी की आत्मा है। ऐसी कोई अन्य वस्तु शेष ही नहीं रह जाती, जो ईष्वर न हों।
ज्ञानयोग के सात चरण:-
यदि कोई मनुष्य ज्ञानयोग का अभ्यास करना चाहता है, तो उसे ज्ञानयोग के सात चरणों को जानना आवष्यक है। ये सभी चरण एक-एक करके व्यक्ति को गहराई से ज्ञानयोग का लाभ प्राप्त करने में सहायता करते हैं। यह चरण कुछ इस प्रकार हैः-
शुभेच्छा:- ज्ञानयोग का पहला चरण है शुभेच्छा यानी सत्य की तलाष। इस चरण में व्यक्ति को सत्य की खोज करने के लिए संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन करना होता है। साथ ही मन में लालसा पैदा करने वाली वस्तुओं के प्रति उसे अपने आकर्षक को कम करने की भी आवष्यकता होती है।
विचारणा:- ज्ञानयोग का दूसरा चरण है विचारणा यानी किसी विषय के बारे में विचार, पूछताछ या जांच करना। इसका मतलब यह है कि ज्ञान योग के दूसरे चरण में व्यक्ति को मन में उठने वाले विचारों के प्रति सवाल करना होता है और उनका सही अर्थ या उद्देष्य क्या है यह जानना होता है।
तनुमानसी:- इस चरण में आने पर व्यक्ति सभी जरूरी बातों को समझ गए होते हैं, जो उनके मन को एकाग्र करने में मदद करती है। इस चरण में आने के बाद व्यक्ति आसानी से अपना ध्यान मन के अंदर केंद्रित करने में सक्षम हो जाता है।
सत्वापत्ति:- इस चौथे चरण में व्यक्ति का मन पूरी तरह से शुद्ध हो जाता है। उसके मन से सांसारिक लोभ दूर होने लगते है और दुनिया में मौजूद सभी वस्तुओं को समान रूप से देखने लगता है।
असंसक्ति:- ज्ञानयोग के पांचवें चरण में आने पर व्यक्ति निस्वार्थ हो जाते हैं और उन्हे प्रत्येक कार्य में आनंद की अनुभूति होती है। व्यक्ति खुद को भ्रम की दुनिया से अलग करने लगता है।
पदार्थभावनी:- छठे चरण में मन से सांसारिक जीवन का भ्रम दूर होता है जिससे व्यक्ति खुद को वास्तविकता में पहचानने लगता है। इस वजह से छठे चरण में आकर व्यक्ति को इसका अनुभव होने लगता है कि सिर्फ आत्मा ही एकमात्र वास्तविकता है और बाकी सब काल्पनिक है। यही बात व्यक्ति को अपनी आत्मा के प्रति जागरूक बनाने में मदद करती है।
तुरीय:- सातवें और आखिरी चरण में व्यक्ति खुद की वास्तविकता से परिचित हो जाता है और व्यक्ति का मन पूरी तरह से साधना की ओर समर्पित हो जाता है। इसके बाद वह स्वयं को पूरी तरह से अध्यात्म के प्रति समर्पित कर देता है।
ज्ञानी चलते-फिरते, खाते-पीते एवं बातचीत करते हुए भी अपना साधना कर सकता है। उसे किसी एकांत या कोठरी में बैठकर आसन लगाने की आवष्यकता नहीं। ज्ञानी सदा समाधि (सहज अवस्था) में स्थित रहता है। उसकी नित्य दृष्टि होने से वह माया के वषीभूत नहीं होता। ज्ञानी के लिए समाधि व व्युत्थान अवस्थाएं नहीं होती, परन्तु जब योगी समाधि से नीचे उतरता है तब उसे माया फिर घेर लेती है। ज्ञानी अपनी वृत्तियों का पूर्ण निरोध न करके उनका साक्षी बन जाता है। वह अपने सात्विक अंतःकरण से आकार वृत्ति उत्पन्न करता है। ज्ञानी अपने सत्संकल्प द्वारा सिद्धियों को प्रकट करता है। जब तक समाधि द्वारा पूर्ण ज्ञान नहीं हो जाता, तब तक पूर्ण शांति उत्पन्न नहीं होती। अतएव ज्ञान पथ के पथिक को ज्ञान प्राप्ति के लिए समाधि का आश्रय लेना चाहिए।
समाधिर्विदुषां स्नानम, समाधिर्विदुषां जपः ।
समाधिर्विंदुषां यज्ञः, समाधिर्विदुषां तपः ।।2
अर्थात ज्ञानियों का समाधि ही स्नान, समाधि ही जप, समाधि ही यज्ञ और समाधि ही तप है। सारांष में समाधि ही पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने का एक मात्र उपाय है।
शिव संहिता में ज्ञानयोग:-
शिवसंहिता ने ज्ञान एवं योग का अभ्यास दोनों को समान महत्व दिया है। दिशाहीन अभ्यास निरर्थक है और ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में ज्ञान प्राप्ति के लिए किया गया योगाभ्यास ही फलित होता है। ज्ञान की चर्चा से पूर्व भगवान शिव ने अज्ञान की विशद चर्चा की है। शिवसंहिता में ज्ञान का उत्कृष्ट वर्णन हुआ है। एक मात्र आत्मज्ञान ही श्रेष्ठ है। आत्मा को जानने के लिए जो आत्मा नहीं है वह जानना भी आवश्यक है संहिताकार ने ज्ञान को आद्यंत, स्थाई तथा सत्यरूप में परिभाषित किया है
एकं ज्ञानं नित्यमाद्यंतशुन्यं नान्यत्किंचितद्विवर्तते वस्तुसत्यम।
यद्भेदोअस्मिन्निन्द्रियोपधिना वै ज्ञानस्यायं भासते नान्यथैव।।3
अर्थात आदि एवं अंत से रहित, नित्य तथा सत्य वस्तु एकमात्र अभेद ज्ञान ही है - इससे भिन्न कुछ भी (वस्तु सत्य) नहीं है। इस एक में जो भेद (अनेकता) की प्रतीति होती है वह इन्द्रियों की उपाधि के कारण ज्ञान (भेद ज्ञान) का ही विस्तार है, इसमें संशय नहीं।
दिशाहीन अभ्यास निरर्थक है और ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में ज्ञान प्राप्ति के लिए किया गया योगाभ्यास ही फलित होता है। ज्ञान की चर्चा से पूर्व शिवसंहिता में ज्ञान विरोधी अज्ञान की विशद चर्चा हुई है। मोक्ष साधना की परंपरा में उपलब्ध ग्रन्थ सम्यक ज्ञान को दिग्दर्शन न होने तथा मत-मतान्तर वाद से मोक्ष प्राप्ति तो दूर एतद् विपरीत साधक को दिग्भ्रमित ही करते हैं।
ज्ञानप्रवाह इत्यन्ते शून्य केचित् परं विदुः।
द्वावेव तत्वम मन्यन्ते अपरे प्रकृतिपुरुषौ।।4
अर्थात कुछ विचारक (विज्ञानवादी) ज्ञान धारा को तो कुछ विद्वान शून्य को उत्कृष्ट मानते हैं। कुछ दूसरे लोग (सांख्यवादी) प्रकृति और पुरुष इन दो तत्वों को ही स्वीकार करते हैं।
अत्यंतभिन्नमतयः परमार्थपरान्मुखा।
एवमन्ये तु संचिन्त्य यथामति यथाश्रुतं।।5
निरीश्वमिदं प्राहुः सेश्वरन्च तथापरे।
वदन्ति विविधैर्भेदेः सुयुक्त्या स्थितिकताराः।।6
अर्थात परमार्थ (परमसत्य) से विमुख भिन्न भिन्न मताग्रही अपनी अपनी बुद्धि एवं श्रुतज्ञान के अनुरूप विचार कर इस (जगत) को निरीश्वर (ईश्वर की सत्ता नहीं है) तो कुछ अन्य विचारक उसे सेश्वर (ईश्वर की सत्ता है) ऐसा कहते हैं। कुछ स्थितिकार (किसी भी सिद्धांत के प्रति दृढ़ न रहने वाले) लोग युक्तिपूर्वक इस (जगत) को अनेक प्रकार से अभिव्यक्त करते हैं।
इस प्रकार यथा ब्रह्मांडे तथा पिंडे सिद्धांत को शिवसंहिता में स्पष्ट करने का ज्ञानयोग प्रकाशित हुआ है। पिंड ज्ञान आत्मज्ञान के लिए आवश्यक है क्योंकि इसी शरीर के द्वारा अशरीरी को जाना जा सकता है। इसे जानने के लिए ज्ञानयोग श्रेष्ठ मार्ग है
आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचारी च पुनः पुनः।
इदमेकं सुनिष्पन्नं योगशास्त्रं परं मतं।।7
सभी शास्त्रों का अवलोकन कर तथा बारम्बार उन पर विचार करके यह सुनिष्पन्न होता है कि एकमात्र योगशास्त्र ही सर्वश्रेष्ठ मत है।
उपसंहार:-
भगवान शिव ने शिवसंहिता ग्रन्थ की रचना साधक के आत्मज्ञान प्राप्त करने एवं आत्ममुक्ति की इच्छा के कारण ही की है। उन्होंने ज्ञान को नित्य, सत्य कहकर अनंत माना है और समस्त सांसारिक भोगों को इन्दियाजनित कहा है। सत्य प्राप्ति का आधार ज्ञान प्राप्ति ही बताया है। ज्ञान के अवलंबन से ही मोक्ष प्राप्ति संभव है। साधक को आत्मसाक्षात्कार कराना ही इस ग्रंथ का मुख्य उद्देश्य है। आत्मज्ञान होने के पश्चात् ही साधक संसार के मोह माया का त्याग कर सकता है और शिवस्वरूप में तदाकार हो सकता है। तब उसका प्रत्येक भाव ही शिव अर्थात कल्याणकारी हो जाता है।
जहं-जहं जाऊ सोई परिक्रमा जो-जो करूँ सो पूजा।
सहज समाधि सदा उर राखूँ भाव मिटा दूँ दूजा।।
ज्ञानयोग में बतलाया गया है कि येनात्मैवात्मनाजितःआत्मा से आत्मा को जीते अर्थात मन से ही मन को जीते। पंचीकृत शरीर नाशवान है, केवल आत्मा ही अविनाशी है, ऐसा विचार करके जीवात्मा अपनी अनेक आवरणों में व्याप्त जीव दशा को व्यतिरेक से नष्ट करके “अहं ब्रह्मास्मि की वृत्ति को अनवरत बनाए रखने का अभ्यास करना चाहिए। ‘वृत्ति जिधर जाए उधर आप न जाए, पीछे साक्षी होकर खड़े-खड़े देखता रहे तो निज स्वरूप से भेंट हो जाती है । अर्थात वृत्ति की ओर देखते रहने से वह आप ही अंदर विलीन हो जाती है।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची:-
1- Kku;ksx deZ;ksx Hkfä;ksx ist 15
2- jkexhrk] 46
3- f'kolafgrk çFke iVy 'yksd 1
4- f'kolafgrk çFke iVy 'yksd 12
5- f'kolafgrk çFke iVy 'yksd 13
6- f'kolafgrk çFke iVy 'yksd 14
7- f'kolafgrk çFke iVy 'yksd 17
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Received on 10.08.2023 Modified on 24.08.2023 Accepted on 07.09.2023 © A&V Publication all right reserved Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2023; 11(3):175-179. DOI: 10.52711/2454-2687.2023.00029 |